Saturday, July 23, 2011

jharkhand liguistic culture

झारखण्ड में भावात्मक एवं साहित्यिक शून्यता का कारण-
सभी प्रदेशो का एक सांस्कृतिक एवं भाषाई पहचान है , परन्तु झारखण्ड की स्थिति बड़ी विचित्र है , झारखण्ड में भाषा की बिडम्बना ये है की झारखण्ड की राजभासा हिंदी का झारखण्ड से कोई ऐतिहासिक सम्बन्ध नहीं है न ही कोई सांस्कृतिक सम्बन्ध है . हिंदी एक नयी भासा है . हिंदी के अनेक रूप है खड़ी बोली ,अवधी,ब्रजभासा ,किन्तु भारत सरकार ने पच्छिम उत्तर प्रदेश में बोली जाने वाली खड़ी हिंदी को राष्ट्र भासा माना. खड़ी हिंदी का दो रूप है एक संस्कृत निष्ठ हिंदी और उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी . हम लोग बोल चल में उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी हिंदी का प्रयोग करते है . भारत में स्वतंत्रता के बाद हिंदी को राजकीय संरक्षण मिला जिससे हिंदी का दुसरे प्रान्तों में फेलाव और विकाश हुआ . किसी भी भासा के विकाश के लिए राजकीय संरक्षण बहुत जरुरी है बिना राजकीय संरक्षण के भय्ये मर या लुप्त हो जाती है जैसा की मैथिलि भासा के साथ हुआ ,ये ३००० बरस पुरानी भासा सरकारी उपेछा के कारण लुप्तप्राय हो गयी है . मैथिलि भासा बांग्ला भासा की जन्मदाता भासा है . बांग्ला भासा की लिपि वास्तव में मिथिलाक्षर है जिसे तिरहुता भी कहते है .
बिहार सरकार में मैथिलि भासा की उपेछा कर के उर्दू को बिहार की द्वितीय राजभासा बना दिया , झारखण्ड में भी बांग्ला भासा की उपेछा कर उर्दू को द्वितीय राजभासा बना दिया . उर्दू का झारखण्ड से क्या सम्बन्ध है , क्या कोई सांस्कृतिक या ऐतिहासिक सम्बन्ध है ,नहीं बिलकुल नहीं , भला अरबी फारसी और तुर्की सब्दो वाली उर्दू भासा का झारखण्ड से क्या सम्बन्ध हो सकता है . झारखण्ड की राजकीय भासा हिंदी खुद एक आयातित भासा है जिसे उत्तर प्रदेश से आयात किया गया है क्योंकि झारखंडी की सदनी या मूल भाषाये बहुत ही कमजोर है . राजकीय कामकाज खोरठा कुरमाली नागपुरिया पंच्पर्गानिया जैसे कमजोर बहसों के बस की बात नहीं है . बांग्ला को झारखण्ड की राजकीय भासा बनाया जा सकता है क्योकि बांग्ला बहुत ही विकसित भासा है तथा तकनिकी रूप से विकसित है . परन्तु झारखण्ड में रह रहे १ करोड़ बिहारी प्रवासियों को जिससे दिक्कत होती . इसलिए ये सही है की हिंदी को झारखण्ड की राजभासा बनाया गया . हिंदी वास्तव में झारखण्ड की राजभासा बनाने के योग्य है परन्तु द्वितीय राजभासा का दर्जा निश्चित रूप से बांग्ला को मिलना चाहिए . बांग्ला बसा का आगमन झारखण्ड में हिंदी से बहुत पहले हुआ . बांग्ला का आगमन झारखण्ड में १००० से १२०० बरस पूर्व हुआ जब झारखण्ड और बिहार के प्रदेशो पर बंगाल के पाल और सेन राजवंसो का सासन था और मुंगेर पाल राजवंश की राजधानी थी . पूरा का पूरा संथाल परगना और अंग प्रदेश भागलपुर अंग प्रदेश में बांग्ला भासा बोली जाती थी तथा मुग़ल काल में राजमहल बंगाल सूबा की राजधानी थी . सन १९११ तक बंगाल प्रेसिडेंसी के अंतर्गत झारखण्ड और बिहार के प्रदेश थे उस समय राजकीय भासा बांग्ला ही थी . समस्त संथाल परगना ,मानभूम ,सिंघ्भुम में बांग्ला माध्यम स्कूल थे . १९५०-५५ तक इन इलाको में बांग्ला माध्यम के स्कूल चल रहे थे कालांतर में इन स्कूल को हिंदी माध्यम में रूपांतरित कर दिया गया . मानभूम संथाल परगना सिंघ्भुम के निवाशी बांग्ला भासा और संकृति से पूरी तरह से जूद चुके थे उस समय एक नयी भासा हिंदी को उन पर थोप दिया गया . संथाल परगना की लोक संस्कृति रीती रिवाज़ धार्मिक क्रियाकलाप पंचांग शिक्षा बांग्ला पर आधारित थी . लोक गीतों अदि पर बांग्ला का प्रभाव था . इन इलाको में बांग्ला भासा के ख़तम हो जाने से एक सांस्कृतिक और भावात्मक शून्यता पैदा हो गयी .नयी और पुरानी पीढ़ी के बीच एक भाषाई खालीपन पैदा हो गया . मानभूम क्षेत्र के पुराने लोग हिंदी बोलना नहीं जानते . आप धनबाद चास चंदनकियारी चांडिल पटमदा सिंघ्भुम के किसी ग्रामीण क्षेत्र में चल जाये और किसी बूढी महिला को पूछ कर देखे वो हिंदी नहीं जानती होगी लेकिन बांग्ला बोलना जरूर जानती होगी . आज हिंदी भारत की राष्ट्र भासा है और झारखण्ड की राजकीय भासा है इसलिए आज हिंदी भासा का महत्वा ज्यादा है इसलिए आज की नयी पीडी हिंदी बोलना पसंद करती है लेकिन झारखण्ड के संथाल परगना मानभूम और सिंघ्भुम के लोगो को बांग्ला भासा को नहीं भूलनी चाहिए क्योकि ये उनकी जड़ो से जुडी हुई है . नहीं तो एक सांस्कृतिक खालीपन पैदा हो जाएगी . आज भी झारखण्ड में गयी जनि वाली टुसू गान बांग्ला में ही है . अर्जुन मुंडा और सिबू सोरेन भी बंगलाभाषी ही है .
झारखण्ड में भासा का कालानुक्रम -
१. कुरमाली ,खोरठा ,संथाली अति प्राचीन
२. बांग्ला - १०००-१२०० बरस पूर्व
३. हिंदी १५० -२०० बरस पूर्व
हम लोग बीच वाले काल क्रम को भूल जाने चाहते है और बांग्ला बोलने में संकोच महसूस करते है .

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