सभी प्रदेशो का एक सांस्कृतिक एवं भाषाई पहचान है , परन्तु झारखण्ड की स्थिति बड़ी विचित्र है , झारखण्ड में भाषा की बिडम्बना ये है की झारखण्ड की राजभासा हिंदी का झारखण्ड से कोई ऐतिहासिक सम्बन्ध नहीं है न ही कोई सांस्कृतिक सम्बन्ध है . हिंदी एक नयी भासा है . हिंदी के अनेक रूप है खड़ी बोली ,अवधी,ब्रजभा...सा ,किन्तु भारत सरकार ने पच्छिम उत्तर प्रदेश में बोली जाने वाली खड़ी हिंदी को राष्ट्र भासा माना. खड़ी हिंदी का दो रूप है एक संस्कृत निष्ठ हिंदी और उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी . हम लोग बोल चल में उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी हिंदी का प्रयोग करते है . भारत में स्वतंत्रता के बाद हिंदी को राजकीय संरक्षण मिला जिससे हिंदी का दुसरे प्रान्तों में फेलाव और विकाश हुआ . किसी भी भासा के विकाश के लिए राजकीय संरक्षण बहुत जरुरी है बिना राजकीय संरक्षण के भय्ये मर या लुप्त हो जाती है जैसा की मैथिलि भासा के साथ हुआ ,ये ३००० बरस पुरानी भासा सरकारी उपेछा के कारण लुप्तप्राय हो गयी है . मैथिलि भासा बांग्ला भासा की जन्मदाता भासा है . बांग्ला भासा की लिपि वास्तव में मिथिलाक्षर है जिसे तिरहुता भी कहते है .
बिहार सरकार में मैथिलि भासा की उपेछा कर के उर्दू को बिहार की द्वितीय राजभासा बना दिया , झारखण्ड में भी बांग्ला भासा की उपेछा कर उर्दू को द्वितीय राजभासा बना दिया . उर्दू का झारखण्ड से क्या सम्बन्ध है , क्या कोई सांस्कृतिक या ऐतिहासिक सम्बन्ध है ,नहीं बिलकुल नहीं , भला अरबी फारसी और तुर्की सब्दो वाली उर्दू भासा का झारखण्ड से क्या सम्बन्ध हो सकता है . झारखण्ड की राजकीय भासा हिंदी खुद एक आयातित भासा है जिसे उत्तर प्रदेश से आयात किया गया है क्योंकि झारखंडी की सदनी या मूल भाषाये बहुत ही कमजोर है . राजकीय कामकाज खोरठा कुरमाली नागपुरिया पंच्पर्गानिया जैसे कमजोर बहसों के बस की बात नहीं है . बांग्ला को झारखण्ड की राजकीय भासा बनाया जा सकता है क्योकि बांग्ला बहुत ही विकसित भासा है तथा तकनिकी रूप से विकसित है . परन्तु झारखण्ड में रह रहे १ करोड़ बिहारी प्रवासियों को जिससे दिक्कत होती . इसलिए ये सही है की हिंदी को झारखण्ड की राजभासा बनाया गया . हिंदी वास्तव में झारखण्ड की राजभासा बनाने के योग्य है परन्तु द्वितीय राजभासा का दर्जा निश्चित रूप से बांग्ला को मिलना चाहिए . बांग्ला बसा का आगमन झारखण्ड में हिंदी से बहुत पहले हुआ . बांग्ला का आगमन झारखण्ड में १००० से १२०० बरस पूर्व हुआ जब झारखण्ड और बिहार के प्रदेशो पर बंगाल के पाल और सेन राजवंसो का सासन था और मुंगेर पाल राजवंश की राजधानी थी . पूरा का पूरा संथाल परगना और अंग प्रदेश भागलपुर अंग प्रदेश में बांग्ला भासा बोली जाती थी तथा मुग़ल काल में राजमहल बंगाल सूबा की राजधानी थी . सन १९११ तक बंगाल प्रेसिडेंसी के अंतर्गत झारखण्ड और बिहार के प्रदेश थे उस समय राजकीय भासा बांग्ला ही थी . समस्त संथाल परगना ,मानभूम ,सिंघ्भुम में बांग्ला माध्यम स्कूल थे . १९५०-५५ तक इन इलाको में बांग्ला माध्यम के स्कूल चल रहे थे कालांतर में इन स्कूल को हिंदी माध्यम में रूपांतरित कर दिया गया . मानभूम संथाल परगना सिंघ्भुम के निवाशी बांग्ला भासा और संकृति से पूरी तरह से जूद चुके थे उस समय एक नयी भासा हिंदी को उन पर थोप दिया गया . संथाल परगना की लोक संस्कृति रीती रिवाज़ धार्मिक क्रियाकलाप पंचांग शिक्षा बांग्ला पर आधारित थी . लोक गीतों अदि पर बांग्ला का प्रभाव था . इन इलाको में बांग्ला भासा के ख़तम हो जाने से एक सांस्कृतिक और भावात्मक शून्यता पैदा हो गयी .नयी और पुरानी पीढ़ी के बीच एक भाषाई खालीपन पैदा हो गया . मानभूम क्षेत्र के पुराने लोग हिंदी बोलना नहीं जानते . आप धनबाद चास चंदनकियारी चांडिल पटमदा सिंघ्भुम के किसी ग्रामीण क्षेत्र में चल जाये और किसी बूढी महिला को पूछ कर देखे वो हिंदी नहीं जानती होगी लेकिन बांग्ला बोलना जरूर जानती होगी . आज हिंदी भारत की राष्ट्र भासा है और झारखण्ड की राजकीय भासा है इसलिए आज हिंदी भासा का महत्वा ज्यादा है इसलिए आज की नयी पीडी हिंदी बोलना पसंद करती है लेकिन झारखण्ड के संथाल परगना मानभूम और सिंघ्भुम के लोगो को बांग्ला भासा को नहीं भूलनी चाहिए क्योकि ये उनकी जड़ो से जुडी हुई है . नहीं तो एक सांस्कृतिक खालीपन पैदा हो जाएगी . आज भी झारखण्ड में गयी जनि वाली टुसू गान बांग्ला में ही है . अर्जुन मुंडा और सिबू सोरेन भी बंगलाभाषी ही है .
झारखण्ड में भासा का कालानुक्रम -
१. कुरमाली ,खोरठा ,संथाली अति प्राचीन
२. बांग्ला - १०००-१२०० बरस पूर्व
३. हिंदी १५० -२०० बरस पूर्व
हम लोग बीच वाले काल क्रम को भूल जाने चाहते है और बांग्ला बोलने में संकोच महसूस करते है .
बोकारो स्टील सिटी ,दुर्गापुर स्टील प्लांट , राउरकेला स्टील प्लांट इन तीनो प्लांट पर आधारित नगरो का तुलनात्मक सामाजिक अध्ययन .
ये तीनो स्टील प्लांट सेल द्वारा स्थापित किये गए है १९५५- १९६० के बीच में . एक तत्कालीन बिहार वर्त्तमान में झारखण्ड , एक पछिम बंगाल में ओर एक उड़ीसा में स्थापित किया गया .
बोकारो इस्पात नगर और चास का नगरिया क्षेत्...र का परिवर्तन और सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव का तुलनात्मक बिशलेषण-
बोकारो क्षेत्र की इतिहासिक पृष्ठभूमि -
ये क्षेत्र मानभूम जिला के अंतर्गत आता था जो की पहले बंगाल प्रदेश का भाग था बाद में बिहार को दे दिया गया . उस से पहले ये काशीपुर एस्टेट राज का भाग था जो की अद्रा के पास है . काशीपुर राज के इस भाग में दो थाने थे चास और चंदनकियारी तथा इस क्षेत्र को खाशपोइल परगना के नाम से जाना जाता था . मानभूम में काशीपुर राज (पुरुलिया) के अलावे झरिया राज , कतरासगढ़ राज और महाल गाव(सेक्टर-८) के जमींदार के अलावे अन्य बहुत सारी छोटी जमींदारिया थी .
राजकीय कामकाज और शिक्षा की भासा - उस समय बंगला भासा में ही सारे काम होते थे हिंदी भासा का आगमन नहीं हुआ था . इस क्षेत्र में हिंदी भासा का आगमन १०० बरस पूर्व हुआ था .
प्राकृतिक रूप से ये प्रदेश बहुत सुन्दर था , ये पूरी तरह से वनाच्छादित प्रदेश था , स्वच्छ नदिया और परिवेश और सुखी जीवन ,तीज ,मेला टुसू करम ,पीठा,छिलका पोस परब वास्तव के खास्पोइल के लोग सुखी थे .यहाँ के लोग विशुद्ध बंगला तो कभी नहीं बोलते थे परन्तु मोटा बंगला या खोरठा मिश्रित बंगला बोलते थे . हिंदी भासा का प्रभाव १९४७ के बाद सुरु हुआ . १९५६ मानभूम जिला का विभाजन बंगाल और बिहार के बीच में हुआ . जिसमे बिहारियों की चालाकी और धूर्तता और बंगालियों के घमंड और झूठा अहंकार
ने मानभूम के लोगो का नुकसान किया . असल में बंगाली बुद्धिजीवी या भद्र लोक जो अपने आप को बोद्धिक और सांस्कृतिक रूप से काफी उच्च समझते थे मानभूम के बंग्लाभासियो को कभी भी मान्यता नहीं दिया या बराबर का नहीं समझा . असल में मानभूम के लोग पूरी तरह बंगाली नहीं है उनकी अपनी विशिस्ट संस्कृति है . वेस्ट बंगाल सरकार ने मानभूम में ज्यादा रूचि नहीं दिखाई .बिहार सरकार ने मानभूम के समृद्ध धनबाद के कोयला खानों को बिहार में रखने के लिए पूरा जोर लगाया . ५ लाख भोजपुरी भाषियों को आरा-छपरा और बलिया से बसाया गया . धनबाद के इलाके में बिहारी बहुसख्यक हो गए और परिणाम को प्रभावित किया . चास - चंदनकियारी का बिहार में रहना और पुरुलिया में न जाना आश्चर्यजनक है . चास चंदनकियारी (खाश्पोइल ) न तो कोल्यिरी या कोयला खान था न ही यहाँ बिहारी भोजपुरी भाषी बसे थे और ये प्रदेश बंगलाभाषी थे . परन्तु चास चंदनकियारी में बिहार के मगध क्षेत्र से आये भूमिहार जाती की बहुत बड़ी आबादी थी . ये भूमिहार मुंगेर गया ,पटना से गिरिडीह से होकर आये और करीब आज से १५० -२०० साल पहले आकर इस क्षेत्र में बस गए थे चास चंदनकियारी में भूमिहारो के ५००-६०० गाव है . इनकी भासा मघही या मघही से मिलती जुलती मघही खोरठा थी . ये बिहार से हाल में आकर बसी थी और बिहार की समर्थक जाती थी ये खोरठा बोलते थे और आर्थिक रूप से समृद्ध थे . भूमिहारो ने चास चंदनकियारी को पुरुलिया डिस्ट्रिक्ट में जाने से रोक दिया .अगर चास चंदनकियारी मानभूम (पुरुलिया) में चला जाता तो उनकी भासा संस्कृति बच जाती .बोकारो और धनबाद में आज भोजपुरी संस्कृति हावी है . स्थानीय लोगो के साथ भोजपुरी लोग बुरा व्यवहार करती है .बोकारो में स्टील प्लांट और चंदनकियारी में एलेक्ट्रोस्टील प्लांट से वोह स्थानीय निवाशियो का कोई फायदा नहीं हुआ . बोकारो स्टील प्लांट में ९०% नोकरिया बिहारी आरा -छपरा के लोगो को मिली और विस्थापितों को केवल धोका मिला उनके साथ छल हुआ . बोकारो में ८० गाव विश्थापित हुआ . १९९२ के बाद विष्ठापितो की बहाली बंद है . बहुत नाममात्र के मुवावजे पर उनकी जमीं अधिग्रहित कर ली गयी . बोकारो और धनबाद में ९०% आबादी बिहारी की है . भोजपुरी भासा और बिहारी धनबाद बोकारो में हावी है पूजीपति ठेकेदारी बाहुबली भूमाफिया , नेता सभी कुछ वोही है हर क्षेत्र में उनका एकाधिकार है . झारखंडी लोगो की हालत गुलामो जैसो है वोह तो बेचारे १००-१५० की हाजरी की मजदूरी पर खुश है . बोकारो के पूरी आर्थव्यवस्था पर बिहारियों का कब्ज़ा है . प्लांट में नौकरी ,सब्जी बेचना फल बेचना दुकानदार चाय समोषा के ठेले , या कोई भी छोटा मोटा व्यापार अगर स्थानीय लोग करना चाहे तो उन्हें मार कर भगा दिया जाता है. बिहारी एक सोची समझी रणनीति के तहत झारखंडी चास चंदनकियारी के लोगो को बंगाली बोलते है ताकि उनका मनोबल तोडा जाय.जिसका गाव झारखण्ड में है वोही झारखण्ड का मूल्निवाशी है चाहे वोह बंगला बोलता हो या खोरठा . शिबू शोरेन , अर्जुन मुंडा भी तो बंगला बोलते , बोकारो के बिधायक समरेश सिंह जो मूलरूप से चंदनकियारी के निवाशी है वो भी बंगलाभाषी तो क्या ये लोग बंगाली हो गए . जैसे हिंदी कई प्रदेश में बोली जाती है मध्य प्रदेश और बिहार तो मध्य प्रदेश के लोग भी बिहारी हो गए क्योकि वोह हिंदी तो बिहार में भी बोली जाती है . बंगला हिंदी से ज्यादा समृद्ध भासा है और तमिल भारत की सर्वाधिक विकशित भासा है .झारखण्ड में जो बंगला बोलते है उनका ९०% झारखण्ड के मूल्निवाशी है केवल १०% बंगाल से आये बंगाली है . झारखंडियो को बंगाली बोलना बिहारियों की दबाब की रणनीति का हिस्सा है . वोह तो खुद तो दुसरे स्टेट के है लेकिन दिखाना चाहते है देखो तुम तो बंगाली हो और धनबाद बोकारो जमशेदपुर पर हमारा हक तुमसे ज्यादा है .झारखण्ड बने के बाद उल्टा असर हुआ , बिहारी झारखण्ड बनने के बाद और सक्तिसाली हो गए जहा जब बिहार था तो जात पात के नाम पर लड़ते थे पर झारखण्ड बने के बाद उनके एकता बढ़ गयी और बिहार में रहने वाले झारखंडी भोजपुरी भासा और बिहारी के नाम पर एक हो गए .चास चंदनकियारी के लोग अब बंगला बोलना छोड़ रहे है . बिहारियों के ताना से बचने के लिए अब वोह खोरठा बोलते है . नई पीढ़ी हिंदी बोलना पसंद करते है . बोकारो चास में रहने वाले स्थानीय लोग अपने बच्चो को हिंदी में अभयस्त कर रहे है . खोरठा इंडो यूरोपियन या आर्य भासा है लेकिन तकनिकी रूप से कमजोर है और हिंदी के सामने टिक नहीं पाती है . खोरठा बोलने वालो को अन्तोगत्वा हिंदी की सरण में आना ही पड़ता है. खोरठा केवल गाव की खेती बाड़ी की भाषा है .चास ता भैलोई ,बिहीन ता रोपैलो , किसान होई , हाल चल टिक होई न बैसे होई न , कहा जय हथिन की रारे हथिन , या गाव घर का लोक संस्कृति . खोरठा भासा का अपना महत्वा है लेकिन उसकी कुछ सीमाए है ये कमजोर भासा हिंदी जैसी सक्तिसाली भासा को टक्कर नहीं दे सकती है . खोरठा भासा के गाने हिंदी गानों के नक़ल मात्र होते है . खोरठा गानों में मौलिकता का अभाव है . कुछ आच्छे गाने जरुर है पर अधिकतर हिंदी गानों और हिंदी धुनों की बेहूदा नक़ल मात्र है . हमार अठारह साल बोयोश भैय गिलोय हमार सदी कराय दे ये खोरठा गाना पुरुलिया के मनभूमि गाना अमर अठारह बरस बयेश होया गले आमके डाल धयाये दे बिहा कराये दे का नक़ल मात्र है . पुरुलिया की मनभूमि भासा और संस्कृति ज्यादा जीवंत ,लोक गीत ज्यादा प्रवाहमान है . झारखण्ड के मानभूम क्षेत्र की संस्कृति मर चुकी है . धनबाद बोकारो में मानभूम संस्कृति मर चुकी है . बंगला भासा का तिरस्कार ने उनकी संस्कृति को बर्बाद कर दिया .सक्तिसाली भासा और संस्कृति को कोई हावी नहीं हो सकता न ही प्रभाबित कर सकता है . खोरठा भासा का वास्तविक क्षेत्र कशमार,पेटरवार गोला रामगढ का क्षेत्र है नाकि चास चंदनकियारी का क्षेत्र , चास चंदनकियारी में हमेसा से ही बंगला भाषा का प्रभाव रहा है . बंगला भासा से कटना और बंगला भासा की उपेछा झारखण्ड के मानभूम प्रदेश के बर्बादी का कारन है .
खोरठा और बंगला दोनों ही आर्य भासा है . भासा बैज्ञानिको ने खोरठा ,कुरमाली , नागपुरी , पंच्पर्गानिया को आर्य भासा या इंडो यूरोपियन भासा समूह में रखा है .बंगला और मराठी इन दो आर्य भाषा में सबसे ज्यादा संस्कृत सब्दो का प्रोग हुआ है . संस्कृत का ज्यादा प्रोयोग इन भाषाओ को मधुर बनता है .
भासा का सक्ति संतुलन - अगर बंगला को द्वितीय राजभासा का दर्जा दिया जाता तो झारखण्ड में भासा का सक्ति संतुलन बन जाता . कुरमाली भासा बंगला भासा के बहुत निकट है . पंच्पर्गानिया+बंग्लाभासा के मिलन से कुरमाली भासा का जनम हुआ . हिंदी ३०-४० बरसो दोरान खोरठा अदि बहसों को ख़तम कर देगा . खोरठा भाषी खोरठा में काम काज पड़ी लिखी नहीं कर सकते है ? उन्हें हिंदी की सरण में आना ही पड़ता है .जब आप पच्छिम उत्तर प्रदेश डेल्ही की खड़ी बोली हिंदी बोल सकते है तो बंगला क्यों नहीं जो की आपके ज्यादा करीब है .हिंदी उन भासा संस्कृति को प्रभाबित कर पाई है जहा की भासा संस्कृति कमजोर है . महारास्ट्र में ३ करोड़ हिंदी भाषी है लेकिन वोह वोह की भासा संस्कृति को प्रभाबित नहीं कर पाई , क्योकि मराठी भासा संस्कृति बहुत सक्तिसाली है .बंगला झारखंडी लोगो को हिंदी के आक्रामक प्रभाव से बचा सकती जो खोरठा कुरमाली बहसों को लीलने के लिए तयार बैठी है . भोजपुरी भासियो के दबदबे को ख़तम करेगी और झारखण्ड में भासा का सकती संतुलन बनाएगी .
दुर्गापुर स्टील प्लांट और राउरकेला स्टील प्लांट -
झारखण्ड के बोकारो स्टील प्लांट के विपरीत दुर्गापुर और राउरकेला में स्थानीय लोगो का दबदबा है . राउरकेला में स्थानीय ओडिया भासा संस्कृति का प्रभाव , कर्मचारी भी अधिकतर उड़िया ही है . स्थानीय व्यापार पर उड़िया लोगो का ही प्रभाव है . राउरकेला में बिहार और आरा - छपरा के लोग न तो रंगदारी कर पाते है न ही वो वोह पर बाहुबली है . उड़िया भासा और संस्कृति पर हिंदी बिलकुल प्रबाव नहीं डाल पाई .अगर भोज्परिया लोग उड़ीसा में कुछ बदमाशी करते है तो जम कर पिटाते है . उड़ीसा में जाकर बाहर के लोग रंगदारी करे ये संभव नहीं है . ऐसा केवल झारखण्ड में ही संभव है जहा बाहर के लोग सासन करते है .भारत के हर नगर प्रान्त में स्थानीय भासा और लोगो का प्रभाव रहता है पर झारखंड में ऐसा नहीं है यहाँ पर बाहर की संस्कृति हावी है . राउरकेला पूरी तरह उड़िया संस्कृति वाला सहर है .
दुर्गापुर स्टील प्लांट - अधिकतर कर्मचारी बंगाली है , और हर क्षेत्र में बंगालियो का ही दबदबा है . यहाँ बिहारियों की सकय अच्छी खासी है . यहाँ भोजपुरी लोग बहुत बड़ी सकय में है लेकिन उनकी यहाँ चलती नहीं है और बिहारी यहाँ पर हावी नहीं हो पाए है . भोजपुरी अगर बदमाशी करते है तो जरुर पिटाते है .बंगला भासा और संस्कृति पर हिंदी या भोजपुरी बिलकुल भी हावी नहीं हो पाई है .व्ययापर पर स्थानीय बंगालियों का बर्चास्वा है .
हिंदी भाषा केवल उन क्षेत्रो को प्रभाबित कर पाई है जहा की स्थानीय भाषा कमजोर है . दखिन भारत के राज्यों तमिलनाडु ,आंध्र प्रदेश ,केरला और कर्नाटक के हिंदी भाषा का कोई प्रभाव नहीं है . दखिन भारतीय हिंदी को कोई महत्वा नहीं देते है कारण उनकी द्रविड़ भाषाये हिंदी की तुलना में बहुत ज्यादा विकसित है . इनका सब्द भंडार बहुत विस्तृत और व्याकरण बहुत उन्नत है . सन २०१२ से तमिलनाडु सरकार तमिल माध्यम में बी.टेक की पढाई सुरू करने जा रही है MBBS तमिल माध्यम में काम हो रहा है तमिल भाषा विकाश सस्थान मदुरै में नित नविन तमिल तकनिकी सब्दो कविकाश हो रहा है . उन विकसित भाषाओ के सामने हिंदी कही टिक नहीं पाती है .इस प्रकार आर्य भाषा मराठी भी समृद्ध भाषा है और ३ -४ करोड़ उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगो के महारास्त्र में बसने के वावजूद भी हिंदी मराठी भाषा संस्कृति को प्रभावित नहीं कर पाई .
झारखण्ड की सदानी भाषाये खोरठा नागपुरिया पंच्पर्गानिया तकनिकी रूप से बहुत कमजोर भाषा से इसलिए हिंदी भाषा के सामने नहीं टिक पाई . झारखण्ड की नयी पीढ़ी इन भाषाओ के बजाय हिंदी बोलना ज्यादा पसंद करती है .झारखण्ड में बंगला भाषा हिंदी से पहले आगमन हुआ १००० बरस पूर्व पर हिंदी को राजभासा बनाया गया परन्तु बंगला को काम से काम झारखण्ड का द्वितीय राजभासा अवश्य बनाना चाहिए जिससे भाषा का सक्ति संतुलन बना रहेगा और कोई भाषा और संस्कृति एक दुसरे पर हावी नहीं हो पायेगी .
इस तरह हम देखते है की झारखंड ही एकमात्र वोह प्रदेश है जहा बाहर के लोग राज कर रहे है ऐसा क्यों है जरा सोचे .
एक बात और २००६ में जब उर्दू को झारखंड का द्वितीय राजभासा बनाया तो किसी ने विरोध क्यों नहीं किया . उर्दू का झारखंड से क्या सम्बन्ध है . अरबी ,फारसी तुर्की सब्दो वाले उर्दू भासा से झारखंड क्या सम्बन्ध है . बड़े दुःख की बात है की उर्दू के २००६ में द्वितीय राजभासा बनने का किसी का विरोध नहीं किया लेकिन बंगला भासा का विरोध करने को लोग हमेशा तयार बैठे रहते है . ऐसा क्यों है ?
झारखण्ड के मानभूम क्षेत्र में कुड्माली भाषा और अन्य भाषाये-
मानभूम के वे क्षेत्र जो झारखण्ड में रह गए (बाकि १९५६ में पुरुलिया में चले गए ) चास -चंदनकियारी , धनबाद , गिरिडीह जिला का धनबाद से लगा क्षेत्र . इन क्षेत्रो में कुड्माली भाषा व्यापक रूप से प्रचलित थी आज से १५०-२०० बरस पूर्व .आज इन क्षेत्रो से कुड्माली भाषा लुप्तप्राय हो चली है .केवल कुछ इलाको में ही बोली जाती है जैसे चास चंदनकियारी के पुरुलिया के सीमावर्ती क्षेत्रो में . इन क्षेत्रो में कुड्माली भाषा का स्थान खोरठा भाषा ने ले लिया है . कुरमाली केवल एक जाति विशेष द्वारा बोली जाति रही है जबकि खोरठा प्राय सभी जाति द्वारा बोली जाति है . खोरठा भाषा का विकाश मगही भाषा से हुआ है . बिहार के मगध क्षेत्र से १५०-२०० बरस पूर्व भूमिहार , मघही या मगधिया कुम्हार तेली ब्रह्मण आदि जातियों का उत्तरी छोटानागपुर ( हजारीबाग , गिरिडीह ) और मगध के गया ,नवादा आदि क्षेत्र से जाति समूहों के मानभूम में बसने से खोरठा का प्रचलन मानभूम क्षेत्र में ज्यादा हो गया , क्योकि कुड्माली केवल कुड्मी जाति द्वारा बोली जाति थी और खोरठा व्यापक रूप से सभी जातियों द्वारा बोली जाति थी इसलिए इसका प्रचलन ज्यादा हो गया . जाति विशेष में सीमाबद्ध होने के कारण कुड्माली भाषा का महत्वा कम होता चला गया . झारखण्ड के मानभूम क्षेत्र के कुड्मी लोग धीरे धीरे खोरठा बोलने लगे और कुड्माली को भूल गए . चास - चंदनकियारी में बिहार से आये मघधिया भूमिहारो ने खोरठा को विशेष रूप से प्रचलित किया .२०० बरस पूर्व खोरठा भाषा के प्रचलन से पहले मानभूम में मोटा मानभूमि बंगला (एक विशेष प्रकार की स्थानीय बंगला भाषा जो की बंगला कुड्माली और खोरठा का मिश्रित रूप थी ) और कुड्माली भाषा प्रचलित थी .खोरठा भाषा के धनबाद ,चास चंदनकियारी में प्रचलन से चास चंदनकियारी से लुप्तप्राय हो गयी . मानभूम में बंगला भाषा १०००-१२०० बरस से प्रचलित थी और कुड्माली उससे भी पूर्व से